Saturday, June 20, 2015

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

कुछ अनुत्तरित प्रश्न जगदीश कश्यप संपादक मिनी युग व विक्रम सोनी संपादक लघुआघात द्वारा प्रेषित किये गए थे  (बीस वर्ष से भी पहले )          प्रश्न व मेरे उत्तर निम्नानुसार है

प्रश्न १ कथानक के दृष्टिकोण से लघुकथा में एक घटना या एक बिम्ब को उभारने की अवधारणा
लघुकथा में कहाँ तक  सार्थक है ?
उत्तर १  –लघुकथा एक कथ्य प्रधान विधा है कथानक सहवर्ती भूमिका में होता है घटना /एक स्थिति /मनःस्थिति को ही कथा  में वर्णित किया जा सकता है एक दृश्य /बिम्ब को भी लघुकथा में पिरोया जा सकता है कई घटना वाले कथानक लघुकथा के लिए त्याज्य है लघु आकार ऐसे कथानक के लिए स्पेस  नहीं देता है एक ही घटना के विभिन्न आयामों में  कहानीकार जा सकता है लघुकथाकार के लिए उचित यही होगा की वह घटना के एक आयाम /पहलू तक ही सीमित रहे उसे अपना पूरा फोकस एक ही आयाम पर रखना है और वहीँ से उसका कथ्य निस्त्रित होता है

प्रश्न २ कहानी में अधिकतर प्रकृतिगत पात्र जैसे पेड़- पौधे आदि उपादान नायक नहीं बनते जबकि
लघुकथा में ये उपादान केंद्रीय पत्र की भूमिका निभा सकते  है इस विषय में आपके विचार क्या है ?
उत्तर २ –रूपक  कथाओं के पारम्परिक भंडार में ऐसी कथाएँ प्रचुर मात्रा में मिल जायगी जिनमें पशु पक्षी अपनी चारित्रिक विशेषताओं के कारण कथा के पात्र बने है पेड़- पौधे और निर्जीव वस्तुओं को भी पात्र बनाया गया है लेकिन कम ये कथाएँ पूर्व  निर्धारित उद्देश्य को ध्यान में रखकर गढ़ी जाती है इनका उद्देश्य शिक्षा देना रहता है जहाँ तक लघुकथा के सामर्थ्य की बात है तो आज के यथार्थ को भी इन्हीं के माध्यम व्यक्त किया जासकता है हालांकि लिखी जा रही लघुकथाओं में इस तरह के पात्र नहीं मिलते .

प्रश्न ३ लघुकथा में कथ्य संरचना के अंतर्गत १ शब्द और वाक्य २ कथोपकथन का होना अत्यावश्यक है
या नहीं ? यदि है तो शब्दों ,वाक्यों तथा कथोपकथनों  में कौनसी विशेषताएं आवश्यक है ?
उत्तर ३ कोई भी रचना बिना शब्द एवं वाक्य के तो सम्भव नहीं है .वाक्य न हो तो शब्द तो हों ही
केवल शब्द मात्र से रची रचनाएँ, दो –चार रचनाएँ ही प्राप्य है जिसमे मेरी लघुकथा ‘हड़ताल ‘व मशकूर जावेद की ‘कैबरे’ अत:यह मानाजा सकता है कि वाक्य के बिना कथा रचना असम्भव है कुलमिलाकर भाषा के बिना साहित्य लिखना संभव नहीं है .
जहां तक कथोपकथन का सवाल है यह अत्यावश्यक तो नहीं पर परिस्थिति अनुसार आवश्यक जरुर है कई रचनाएँ वर्णन और विवरण से ही गठित होती है जैसे किसी की मनस्थिति या कोई स्थिति को वर्णित करने वाली रचनाएँ.फ्लैश बैक में जानेवाली रचनाएँ भी कथोपकथन का कम इस्तेमाल करती हैया नहीं भी करती .साधारणतया लघुकथा में कथोपकथन आता है उससे कथा में जीवन्तता बनी रहती है अगर कथोपकथन से कथ्य के सम्प्रेषण सटीकता ,तीव्रता और आसानी होती है तो लेखक अपनी रचना में इसका उपयोग करेगा अन्यथा नहीं . कथोपकथन संक्षिप्त और कथा प्रवाह को आगे बढ़ानेवाले हों

प्रश्न ४ लघुकथा में काल दोष का क्या महत्त्व है ?मसलन इसमें वर्षों और महीनों को बयान नहीं किया जा सकता .अगर किया जा सकता है तो किस तरह ?

उत्तर ४ कभी कभी कथ्य को अभिव्यक्त करने के लिए ऐसे कथानक चुने जाते है जिनका समय विस्तार वर्षों तक फैला हो ऐसे कथानक कहानी के लिए मुकम्मिल है लघुकथा के लिए नहीं .समय के इस विस्तार को ही लघुकथा के सन्दर्भ में काल दोष कहा गया है .कथ्य की एकांतिकता,विधा की लघुता ,
कथानक की संक्षिप्तता के कारण कल दोष रहित कथानक लघुकथा के लिए उत्तम मानेजाते है लघुकथा
एक सुगठित और कसी हुई विधा है इसलिए भी समय विस्तार वाले कथानक उपयुक्त नहीं है  कल अंतराल को फ्लैश बैक शैली से पाटा जा सकता है संक्षिप्तीकरण का सिद्ध हस्त लेखक भी अपने कथनों
,मुहवारोंवा सूक्तियों से कल दोष की खाई को पाट सकता है

प्रश्न ५ कुछ लोग कथोपकथन से अपनी रचना शुरू करते और   कथोपकथन  से ही समाप्त कर उसे
लघुकथा की संज्ञा देते है .क्या इसे लघुकथा की परिधि में माना  जा सकता है
उत्तर  5 कथोपकथन अप्रत्यक्ष रूप से वातावरण, देशकाल इत्यादि का निर्माण करते हैं ;कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हैं ,पात्रों की विशिष्टताओं को दर्शाते है तो उन्हें कथा मानने से इंकार कैसे किया जा सकता है
अगर संवाद कथा की पृष्ठभूमि,प्रवाह और अन्विति तक नहीं पहुंचाते है तब वह कोरा वार्तालाप
रह जायगा और कथा की पूर्णता का एहसास नहीं दिला पायगा .जगदीश कश्यप ने ही वार्तालाप
को एकांकी की श्रेणी में रखना चाहा था लेकिन एकांकी मंच पर अभिनीत की जाने वाली विधा है
जबकि कथा पढ़ी जानेवाली विधा है इनकी जरूरते भी अलग अलग है इसमे द्दश्य संयोजन ,रंग
निर्देश ,पात्रों के हावभाव ,वेशभूषा ,मंच पर उनकी  स्थिति मूवमेंट ,बोलने के अंदाज आदि तत्व
होते हैं जो लघुकथा में नहीं पाये जाते  विधाओं के घालमेल का विवाद उचित नहीं माना जा सकता है

प्रश्न ६ लघुकथा की भाषा कैसी हो  ? आपके विचार ?
उत्तर  6  लघुकथा की भाषा जहाँ तक सम्भव हो सरल व्यावहारिक जनभाषा होनी चाहिए. भाषा
में मुहावरे और लोकोक्तियों का भी भरपूर प्रयोग होना चाहिए. भाषा पात्रानुकूल होना चाहिए लेकिन क्षेत्रीय भाषा का अत्यधिक प्रयोग आज के हिंदीभाषी के लिए बोधगम्य नहीं होगा. लंबे और जटिल वाक्य कथा के प्रवाह को रोकते है रचना में उनकी वजह से क्लिष्टता आती है और कथ्य की   संप्रेषणीयता को संदिग्ध बनाती है आजकल भाषा के सम्बन्ध में एक और प्रवृति देखी गई है अंग्रजी शब्दों और वाक्यों का अत्यधिक प्रयोग जो हिंदी लघुकथा के लिए उचित नहीं कहा जा सकता है

प्रश्न ७ लघुकथा की  शैली गठन पर अपने विचार दीजिए
उत्तर ७ 
कई शैलियाँ कथा कारों के द्वारा अपनाई  गई है संवाद शैली काफी लोकप्रिय हुई है इसी तरह विरोधाभासऔर विडंबनात्मक शैली का प्रयोग तो प्रत्येक कथाकार ने किया ही होगा इसके बाद व्यंग्य का भी लघुकथा में खूब प्रचलन है .एकालाप , रूपक व दृष्टान्त प्रतीक ,फैटैसी,सस्मरण , अमूर्त व पत्र शैली ,आत्मकथात्मक और आत्मविश्लेषण शैली का भी कथाओं में प्रयोग हुआ है


प्रश्न ८ एक आदर्श या श्रेष्ठ लघुकथा में किन किन विशेषताओं का होना आवश्यक है ?
ऐसी लघुकथाओं के एक दो उदाहरण दिए जा सकते है
उत्तर ८ लघुकथा सुगठित और कसी हुई होनी चाहिए द्वंद्व से आरम्भ होकर तेजी से गंतव्य तक
पहुंच कर अपने मंतव्य को संप्रेषित करना चाहिए  कथ्य जीवन के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करना चाहिए
समकालीन लघुकथा में बोध,उपदेश और नैतिकता के पाठ नहीं हो इस बात का भी खास ख्याल रखा
जाना चाहिए  कथानक हमेशा संक्षिप्त हों लंबे कई मोडों वाले कथानक लघुकथा के लिए त्याज्य है

इसी तरह विवरण और वर्णन भी त्याज्य है कथा में लेखक की सर्जनात्मकता झलकना चाहिए कही अखबार की रिपोर्टिंग न हो जाए लघुकथा इस बात का लेखक को खास ध्यान रखना चाहिए 

Sunday, August 24, 2014


                                                                                                 

मानवीय मूल्यों की हित चिंता पूरन मुदगल की  लघुकथाऍ   


भगीरथ

वैसे तो पूरन मुदगल  का जन्म फाजिल्का पंजाब में हुआ लेकिन इनकी कर्मभूमि हरियाणा ही रही व चौबीस  दिसम्बर 1931 को जन्में श्री मुदगल व्यवसाय से शिक्षक रहे। वे प्रौढ़शिक्षा  अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए । उन्होनें नवसाक्षरों के लिए ‘पहला झूठ’ पुस्तक लिखी । उन्होंने करीब दो वर्ष तक ‘अक्षर पैगाम’’ नामक पाक्षिक पत्रिका का सम्पादन किया। शिक्षा के साथ -साथ वे साहित्य और विशेषकर लघुकथा से संबद्ध रहे। वे प्रगति शील  लेखक  संघ की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य रहे तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन   ( सिरसा ) के विभिन्न पदों पर कार्य किया। साहित्य और शिक्षा से संबद्ध पूरन मुदगल अब भी साहित्य सेवा में रत है।


जून 1964 में हिन्दी मिलाप (जालंधर) में प्रकाशित  लघुकथा ‘कुल्हाड़ा और क्लर्क’ हरियाणा -पंजाब की प्रथम प्रकाशित  लघुकथा है। श्री मुदगल का लघुकथा संग्रह ‘निरंतर इतिहास’ (1982) हरियाणा का प्रथम लघुकथा संग्रह है इसके पहले सुगनचंद मुक्तेश  का ‘स्वाति बूंद’ (1966) में प्रकाशित  हुआ लेकिन वह नीति -उपदेश  कथा के दायरे में आता है जबकि ‘निरंतर इतिहास’ आधुनिक हिन्दी लघुकथा का प्रतिनिधित्व करता है।
श्री मुदगल के शब्दों में ‘लघुकथा किसी वास्तविक घटना, व्यक्त्ति या अनुभव के संवेदनशील  अंश  का काल्पनिक वृत्त है। निःसंदेह वे आधुनिक लघुकथा को यर्थाथ से जोड़ते हैं लेकिन उनके लेखन की समीक्षा करते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि वे उस समय लिख रहे थे जब आधुनिक लघुकथा अपना स्वरूप गढ़ रही थी। कृष्ण कमलेश  के शब्दों में ‘बेहतर फार्म’ की तलाश  में थी। अतः उनके संकलन को ऐतिहासिक मानते हुए निर्मम समालोचना की जरूरत नहीं है , उस समय लघुकथा के बारे में एक बात तो स्पष्ट थी कि कथ्य तेज तर्रार हो । उनका कथ्य प्रकटीकरण प्रभावशाली हो  लेकिन सरल सुबोध शैली प्रबुद्ध पाठकों को आकर्षित नहीं कर पाती। हो सकता है श्री मुदगल ने कई लघुकथाएं नवसाक्षरों केा ध्यान में रखकर लिखी हो।
हम आज अपने लाभ व नुकसान की दृष्टि से सही व गलत का निर्णय करते है। नैतिक मूल्यों के निर्धारण का समाजपेक्षी दृष्टिकोण अब बदल कर व्यक्तिपेक्षी हो गया है। हम ही है जो बच्चों को ‘पहला झूठ’ बोलना सिखाते है। विडम्बना देखिये  कि बेइमान व्यक्ति भी अपने यहां ईमानदार कर्मचारी चाहता है (सबसे बड़ी बात) ‘साहस’ की बात करने वाला स्वयं साहसहीन है।
बड़े लोग ‘जीत’ हासिल कर ही लेते है , चाहे इसके लिए षड़यंत्र का सहारा ही क्यों ने लेना पड़े । ‘बिना टिकट’ में रेल विभाग के टिकट का पैसा टी.टी. व यात्री में बंट जाता है. ‘बकाया’ मार्मिक लघुकथा है। बस कन्डक्टर यात्रियों की बकाया राशि  हड़प जाता है।  लेकिन एक दिन उसकी पुत्री इन्हीं बकाया पैसे की टाफिया खरीद कर खुश  होती है, तोे उसकी अंतरात्मा में विचार कौंध  जाता है कि उसने न मालूम कितनों की खुशियां छीन ली है। ‘दोस्त’ कहां रहे गये है। औपचारिकताएं स्वार्थ और सुविधाओं के हिसाब रहे गये है । ‘पतन’ में प्रश्न पत्र लीक होने को चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा मानने वाला स्वयं लीक हुए प्रश्नपत्र का स्त्रोत पूछ रहा है। शहरी बहू उपयोगितावादी समझ रखती है , पुराने कपड़े देकर बरतन लेती है जबकि उसकी ग्रामीण सास दयावश  गरीबों को पुराने कपड़े पहनने को दे देती है । उपयोगितावाद ने मनुष्य को भावहीन कर दिया है। ‘जुनून’ में आदमी साम्प्रदायिकता के वशीभूत हो निरपराध को मार देता है जबकि कुत्ता भी अपराधी को सूंघकर , उस पर आक्रमण करता है।
‘अबीज’ मुदगल  की विशिष्ट रचना है। यह आर्थिक उदारीकरण व भूमंडलीकरण के दौर की कथा है। जिसमें यह दर्शाया  गया है कि लाभ कमाने के उद्देश्य  से गेहूं का ऐसा बीज बनाया है जो बाली से निकलकर फट जाता है । अगली फसल के लिए यह बीज का काम नहीं कर सकता । किसान को हर बार बीज उसी कम्पनी से लेना पड़ेगा। लाभ की अंधी दुनिया में मनुष्य व उसके सरोकार बहुत पीछे छूट गये है।
मेहनत कश  जीवन को छूती ‘निरंतर इतिहास’ कथा में इस बात को रेखांकित किया गया है कि हजारों सालों से मजदूर के साथ दास जैसा व्यवहार किया जात रहा है। ‘भाव ताव’ में ओस की बूँदों  और पसीने के बूंदों की तुलना इस तरह की गई है कि पसीने की बूँदे  अधिक मूल्वान लगने लगी । ‘अपनी साईकिल’ ज्यादा मूल्यवान है , उत्तराधिकार में मिली कार से।
‘पूरी सच्चाई’ यह है कि जनता के मेहनतकश  हिस्सों की मांग तभी मानी जाती है जब चुनाव आसन्न हो। ‘स्वेच्छाचार’ सत्ता का स्वभाव है। स्वेच्छाचारी राजा दूसरों को दंडित करने में सुख का अनुभव करता है। ‘रिहाई’ में राजनैतिक तिकड़म को उजागर किया गया है । पुरन मुदगल  की राजनीति से संबधित लघुकथाओं में स्वेच्छाचारिता , तिकड़म, पांखड , गिरते नैतिक चरित्र, संसद का अवमूल्यन , येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होने की प्रबल आकांक्षा आदि को रेखांकित किया गया है।
धर्म के बाह्यचारों को ही धर्म समझकर पुण्य बटोरने की नीयत से वह ‘तीर्थयात्रा’ करता है। लेेकिन वहां भी वह दुनियादारी में फंसा रहता है और तीर्थयात्रा मात्र पांखड होकर रह जाती है। ब्राह्मण को रोजगार की तलाश  थी और उसे दयाकर खाना बनाने व बर्तन मांजने का काम दिया जाता है , तो वह भड़क उठता है।मेरा  धरम भ्रष्ट कर रहे हो । यानि वह जाति को धर्म से जोड़ देता है । ब्राह्मण होकर झूठे बरतन साफ करूंगा जातीय अहंकार को प्रकट करता है। यहां श्रम की महत्ता को नजरअंदाज किया गया है। ‘बाहर - भीतर' में भक्त भगवान से अपने निहित स्वार्थ को पूरा करने की प्रार्थना करते है। जबकि अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती है । वे अंतरात्मा को बाहर रखकर भीतर भगवान की पूजा प्रार्थना कर आते है। ‘मेरा पंडा’ में भक्त का परिवार संगम में नाव उलटने से बच जाता है तो वह पंडे को खूब दान - दक्षिणा देता है , जबकि उसी नाव में सवार दूसरे व्यक्ति ने नाविक को 50 रू. और धन्यवाद दिया कि उसने सबकी जान बचायी। ये रचनाएं धार्मिक विश्वासों, अधंविश्वासों और पाखंड को उजागर करती है लोग बाह्यचारों में फंसे , धर्म के मर्म तक नही पहुंच पाते। वे भगवान को अपनी आकांक्षाएं पूरी करने वाली एक एजेंसी  के रूप में देखते है। वे उस धारणा में विश्वास  करते है कि भगवान कुछ भी कर सकता है, और अगर वे प्रार्थना से प्रसन्न होंगे तो उनकी आकाक्षाएं पूरी कर देंगे।
डाॅ  शंकर पुणतांबेकर ने ‘निंरतर इतिहास’ की समीक्षा करते हुए लिखा है ‘पूरन मुदगल  संस्कार के लघुकथाकार है’ यानि कुसंस्कारगत व्यक्ति के चित्रण में सिद्धहस्त है। मानवीय जीवन में मूल्यों के पतन पर वे विशेषतौर पर चिंतित नजर आते है।
हंसराज रहबर ने ‘निंरतर इतिहास’.की भूमिका में लिखा है .......इनके पात्रों में अध्यापक  शिष्य , नेता, व्यापारी , मजदूर , स्त्री - पुरूष, बच्चे सभी दिखाई पडेंगे। मुदगल  ने जीवन की साधारण घटनाओं को इस तरह उकेरा है कि वर्तमान समाज का कोई न कोई सत्य आपकी नजरों के सामने साकार हो जाता है। उदाहरण के लिए ‘पुल’ की घटना किसी व्यक्ति की घटना नहीं है। हमारे सामाजिक जीवन का सामान्य सत्य है। उनकी लघुकथा जातिवाद पर करारा प्रहार है। भ्रष्टाचार और कालाधन हमारी जिंदगी में कहां तक घर कर गया है। ‘बिना टिकट’ और तीन ईंट - तिमंजला मकान’ इसके सशक्त उदाहरण है। ‘सौन्दर्य’ में घटना मामूली है , लेकिन इससे लेखक का दृष्टि कोण स्पष्ट होता है। कुछ लोग अपने सुख सौन्दर्य के लिए किसी दूसरे का घर नष्ट हो जाए तो इसमें कुछ बुराई नहीं समझते है, लेकिन लघुकथा के नायक को यह बात पंसद नहीं , उसके भीतर का मानव पुकार उठता है। मुझे ऐसा सुख नहीं चाहिए , ऐसा सौन्दर्य नहीं चाहिए । यह तो साम्राज्यवाद का सौदर्य है।
श्री मुदगल सामाजिक व राजनैतिक विद्रूपताओं  के विषय उठाते है साथ ही वे संबधों में पनप रहे स्वार्थ, पाखंड पूर्ण चरित्र और अभिजात्य के नाम पर पनप रहीं सांस्कृतिक  विद्रूपताओं के विषय भी अपनी लघुकथाओं में उठाते है।
वर्तमान भारतीय राजनीति पर टिप्पणी ‘पूर्व अभ्यास’ में की गई है। क्लास में शोर व नारेबाजी होती देख, अभिभावक मुख्याध्यापक से पूछता है ‘यह सब क्या चल रहा है।’ मुख्याध्यापक ने बताया कि माॅक संसद का पूर्वाभ्यास चल रहा है। यह भारत की संसदीय राजनीति की एक विकृति की ओर ईशारा  करती है। ‘स्वागत’ के भूखे नेताओं और अधिकारियों को गच्चा देने के लिए गांववालों ने एक स्थायी स्वागत द्वार बना दिया है ‘लोकप्रिय’ नेता का यह हाल है कि उसकी सभा में गिने - चुने लोग है , लेकिन वह हताश  नहीं है , घोषणा करवाता है कि आपके लोकप्रिय नेता आपका इंतजार कर रहे है, क्योंकि भाषण खोखले साबित हो चुके है। ‘भविष्य’ में नेता के कथनी - करनी के अंतर को दर्शाया  गया है। वे भाषणों में जनता का उदबोधन न करते हुए कहते है कि हम अपने भविष्य के स्वयं निर्माता है। वही व्यक्ति अपना भविष्य अखबार में देखता है।
‘अमरता’ आध्यात्मिक धरातल को छूती है तो ‘सम्मान’ सामाजिक रूढि़यों को ढोते रहने की विवशता दिखाती है। पूरन मुदगल की लेखकीय चिंता राजनीति के गिरते स्तर , सामाजिक मूल्यों के पतन, धार्मिक पांखड और अंधविश्वास , संबधों में घुस आए स्वार्थ के साथ ‘ साथ मेहनतकश के श्रम की महत्ता को रेखांकित करती है इनकी लघुकथाओं की सबसे बड़ी कमजोरी उसका शिल्प पक्ष है लेकिन हमे नहीं भूलना चाहिए कि ये लघुकथाएं उस दौर की है जब लघुकथा शैशव अवस्था में थी।
‘निंरतर इतिहास’ की समीक्षा करते हुए ललित कार्तिकेय लिखते है , ‘कथा के लघु होने से कथाकार और उसके सामाजिक कलात्मक दायित्व लघु नहीं हो जाते, बल्कि बढ़ जाते है। पूरन मुदगल की लघुकथाओं का यह संग्रह किसी -किसी कथा में शिल्प और दृष्टि को संतुलित कर वास्तव में उनकी प्रतिभा के प्रति आश्वस्त  करता है।
पूरन मुदगल द्वारा अपनाई गई रचना विन्यास की विभिन्न तकनीकों  पर प्रो. रूपदेव गुण कहते है। लेखक ने तुलनात्मक तथा प्रतीकात्मक पद्वतियों का सहारा लिया है। ‘भाव - ताव’ कथा में ओस की बूंद तथा पसीने की बूंद की सुदंर ढंग से तुलना की गई है। ‘सहारा’ में बोगनबिलिया  की बेल के सहारे प्रतीक पद्वति को उभारा गया है। विरोधाभास व कथनी -करनी के अंतर से भी रचना विन्यास किया गया है। दोहरे चरित्रों के पाखंड को खोलने में भी विरोधाभास महत्वपूर्ण तकनीक हैं लेकिन यह तकनीक अब काफी रूढ़ हो गई है इसमें अब कुछ नया करने की जरूरत है। पूरनमुदगल   की लघुकथाओं में व्यंग्य की मार है, तो कहीं हृदय के भाव है, अंतरात्मा की पुकार भरी है।वे ऐसे समाज की कल्पना करते है जहां मनुष्य संसस्कार से परिपूर्ण हो, नैतिक  मूल्यों से आप्लावित होकर, व्यक्तिवादी सोच छोड़कर पुनः समाजपेक्षी दृष्टिकोण अपनाए।

Thursday, March 21, 2013


      
कृति एवं कृतिकार
                     भगीरथ कृत पेट सबके है
           
                                         हितेश व्यास      

जिस प्रकार शिवराम का नाम नुक्कड़ नाटक के प्रारभ कर्त्ताओं में शुमार किया जाता है , उसी प्रकार भगीरथ परिहार लघु कथा के संस्थापकों और इस विधा के स्थापकों में से एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है , वरिष्ठतम लघु कथाकारों की  प्रथम पंक्ति में शामिल भगीरथ परिहार का यह संकलन दिशा  प्रकाशन, दिल्ली से सन् 2000 में प्रकाशित हुआ, किसी विधा के श्री गणेश कर्त्ताओं पर दोहरी जिम्मेदारी रहती है , उन्हें उस विधा में रचनाएं तो करनी ही होती है , उस विधा का सौंदर्य शास्त्र भी रचना पड़ता है भगीरथ परिहार ने ये जिम्मेदारी बखूबी निभाई है ‘पेट सबके है' की दस पृष्ठीय सुदीर्घ भूमिका ‘‘लघुकथा लेखन की सार्थकता’’ शीर्षक से आरम्भ में लिखी है , वह यूं ही नहीं है कृति में प्रवेश से पूर्व भगीरथ परिहार के विधा संबधित अन्य योगदान पर दृष्टिपात करते है.

भगीरथ परिहार ने 1972 -73 में लघुकथा केन्द्रित प्रथम पत्रिका ‘‘अतिरिक्त का सम्पादन किया ‘अतिरिक्त’ के अंकों में प्रकाशित रचनाएं लघुकथा की उत्कृष्ट उदाहरण है चूंकि उस समय तक लघुकथा विधा रूप में प्रतिष्ठित नहीं हुई थी , सम्भवतया इसीलिए पत्रिका का नाम करण ‘अतिरिक्त ’ किया  गया सन् 1974 में भगीरथ ने प्रथम लघुकथा संकलन ‘गुफाओ से मैदान की ओर’ का सम्पादन किया जिसमें उस समय के महत्व पूर्ण लघु कथा लेखक सम्मिलित थे, इस संकलन का शीर्षक यह सभंवतया इसलिए रखा गया कि उस समय तक लघु कथा विधा गुफाओं में कैद थी जिसे भगीरथ परिहार के समकालीन लघु कथाकार मैदान में लाये, भगीरथ ने लघु कथा के संदर्भ में कई सैद्धांतिक व व्यवहारिक समालोचना के आलेख लिखे। इतना ही नहीं, सन् 2004 में परिहार ने ‘‘राजस्थान की चर्चित लघु कथाएं व सन् 2003 में पंजाब की चर्चित लघु कथाएं पुस्तकों का सम्पादन किया, लघु कथा के चर्चित लेखकों व तत्कालीन रचनाकर्म पर टिप्पणियॉ की। मई 1975 में ब्यावर , अप्रेल 1977 में रावतभाटा 1980 में होशगाबाद 1987 में जलगांव, महाराष्ट्र 1988 में पटना , 1989 में बरेली, 2003 -2004 व 2007 में अंतर्राज्य लघुकथा सम्मेलनों में सन् 2011 में राजस्थान साहित्य अकादमी की संगोष्ठी में भागीदारी की । भगीरथ परिहार ने 200 से अधिक लघुकथाओं की रचना की और लघुकथा पर कई समीक्षात्मक आलेख सृजित किये।

प्रस्तुत संकलन में पचहत्तर लघुकथाएं है। शीर्षक लघुकथा ‘पेट सबके है’ अकाल में मजदूर के शोषण की कथा है। लूबा व देवा मजदूर है और मजबूर है । मजबूरी उनसे कम से कम पैसे में मजूरी करवा रही है । शोषक उनकी विवशता का लाभ उठाता है, पेट सबके हैं शीर्षक में सादगी और अनाकर्षण है , इससे लघुकथा विधा के दो लक्षणों का पता चलता है। एक तो यह कि यह रूप  आधारित विधा नहीं है , दूसरा यह कि यह कथ्य प्रधान है , 'आग' सम्पन्न और विपन्न की दुनियाओं की कथा है , सम्पन्न सर्दियों में विपन्न को कम्बल बांटने निकले है ।  विपन्न में चेतना युक्त कहता है, ‘‘दिनभर लूटो और रात के वक्त फर्ज निभाओ विपन्न में से बुधिया कहता है ‘हम गरीब सही भिखमंगे तो नहीं ‘चेतनावान नक्सली कहता है ‘‘अपनी लूट को इन्सानियत का जामा पहना रहे है। ‘‘सरदी बढ़ गयी है। आओ आग के पास बैंठेगे’’ के साथ लघुकथा का समापन होता है, 'सोते वक्त' वृद्ध दंपति के अकेलेपन की व्यथा कथा है संवाद के रंजन से अलग-थलगपन को पूरते है ‘गोली नहीं चली' वर्गसंघर्ष की कथा है , 'शर्त' मानव-मुक्ति की संघर्ष-कथा है , 'तुम्हारे लिए' लोकतंत्री प्रदर्शन और हड़ताल से आगे बढ़कर सशस्त्र संघर्ष की तैयारी की कहानी है , 'फूली' रूढ़िवादी ढोंग , पाखण्ड विरोधी सकारात्मक कर्म प्रर्वतक रचना है, 'बघनखे' अय्याश वर्ग द्धारा दैहिक शोषण की प्रतीकात्क लघुकथा है , 'दाल-रोटी' व्यवस्था द्धारा पालतू बनाये जाने की चालक कथा है , 'कनविंस करने की बात' आर्थिक लालच के लिए पति द्धारा पत्नी के दैहिक समझौते की पतन कथा है ,
 'खामोशी' कष्ट में भी जातिवादी दुराग्रह और विवशता जन्य पशुवत समाधान की करूण कथा है ,
'भीख' व्यवस्थागत सडांध की अस्पताली व्यथा है जिसमें पैसे के सर्वग्रासी शिकंजे की गिरफ्त दर्शायी गई है , 'युद्ध' आपातकाल का बिना नाम लिए उसके प्रभाव और दुष्प्रभाव की कथा है जो युद्ध के प्रभाव-दुष्प्रभाव पर भी चस्पां होती है 'शिखण्डी' व्यक्ति के समग्र पतन की क्रमिक कथा है जिसका अंतिम वाक्य ऐसे वर्ग चरित्र को उजागर करने वाला है , 'उपलब्धि और अनुपलब्धि के अंतिम घेरो के बीच झूलता हुआ जीवन के हर क्षेत्र में शिखण्डी सा खड़ा है ’’। "मजबूरी  और जरूरत" सम्बधों में आई आर्थिक स्वार्थपरता, रिश्ता निभाने की मजबूरी स्त्री को भोग्या समझने की पुरूष सोच, पुरूष की विवाहेतर विलासिता आदि बिन्दुओं को उठाने वाली लघुकथा  है। ‘हक’ एक स्त्री चेतना की कथा है , संपति में पुत्री के हक की आड़ में एक दामाद अपने सास-ससुर पर दावा करना चाहता है परंतु पुत्री पति के बहकावे में नहीं आती है बल्कि पति के मंसूबों को उसी के समक्ष उजागर कर देती है ।  ‘कछुए’ सम्बधों के सैद्धांतिक विवेचन की सामयिक व्याख्या प्रतीकात्मक रूप से करती है ,
‘सूनाआकाश ’ रेबारियों की व्यथा - कथा है , रोटी के लिए भटकाव और त्रासदियों का सिलसिला , ‘नाटक' रोजगार देने के नाटक का पर्दाफाश करती है , अज्ञानी साक्षात्कार कर्ता इंटरव्यू का नाटक करते है , योग्यता को बाहर का रास्ता दिखाते है और सिफारिशी  को लेते हैं, ‘सही उपयोग’ चुनाव के समय व्यवस्था का चेहरा दिखलाती है , ‘सयानी लड़की’ स्त्री के जागरूक होने की कहानी है यह प्रासंगिक रचना है , जो चेतना इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक में नजर आ रही है उसका पूर्वाभास भगीरथ परिहार को बीसवीं सदी के अंत में हो गया था, "शहंशाह और चिड़िया" सत्ता के दुष्चक्र और जनता की स्वाधीनता की कथा है  , ‘मकान’ में दूसरे के अहित की कीमत पर स्वहित पूर्ति की कुत्सित कामना है , "अपना -अपना दर्द" में घरेलू बाईयों की वेदना है तो साथ ही सुखी व्यक्ति के दुख का चित्रण है ,

"मेह बरसे तो नेह बरसे" शीर्षक के अनुरूप मेह के महत्व को रिश्तों की सरसता से जोड़ने वाली रचना है , "दोजख" में नर्क की पारम्परिक कल्पना का सहारा लेते हुए कथाकार उस व्यक्ति को दोजख की आग में झोंकता है जो कारूणिक दृश्य का मात्र दृष्टा बना रहता है और संवेदनहीनता का परिचय देता है "‘पिता ,पति और पत्नी" एक भारतीय स्त्री की धैर्य गाथा है , पति शराबी है , पुत्र मॉं से अलग बसने का सुझाव देता है पर पत्नी पति को नियति मान लेती है "ओवर टाइम" स्वार्थपरता से उत्पन्न संवदेनहीनता को व्यक्त करती है , "टेक्टिकल लाइन" में साहित्य में व्याप्त समझौतापरस्ती का चित्रण है , "शाही सवारी" राजनेताओं की अगवानी में जनता के पिसने की सनातन कथा हे ‘आत्मकथ्य’ श्रमिक के त्याग और प्रतिदान में अभावों का अनंत क्रंदन है , ‘दुभवाला आदमी’ शोषक के समक्ष शोषित की समर्पण कथा है , "औरत" में स्त्री का हिंसक प्रतिशोध है , ‘जनता-जनार्दन’ में विद्रोह की संभावना का दमन करके जनता का शाश्वत शोषित स्वरूप दर्शाया  गया है , "लोमड़ी" में राजनीति की कुटिलता है ‘शिक्षा’ में वर्तमान शिक्षा के विद्रुप से साक्षात है , "राहतकार्य" व्यंग्य कथा है जिसका समापन मुख्य मंत्री के इस कथन से होता है , ‘‘हमारे विधायक होकर साढ़े सत्ताईस रूपये के कपड़े पहने रहे तो देश से गरीबी कैसे समाप्त होगी’’ ‘अवसरवादिता’ राजनैतिक अवसरवादिता केन्द्रित रचना है , "चियर्स" नेताओं की कथनी-करनी के स्पष्ट अंतर को रेखांकित करती है , ‘दशहत" आर्थिक शोषण की पंचतंत्री कथा है , "यस सर" व्यवस्थागत सांठ गांठ प्रगट करती है , "गंगाजल" रूढ़िवाद के परिणाम स्वरूप कर्जदार होने की रचना है , ‘बेदखल’ अपनों की बेरूखी बताती है , "लोकतंत्र के पोषक" में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री के इस्तीफे और कुछ अंतराल के बाद पुनः चुन लिये जाने की चिर प्रासंगिक बानगी है , ‘आधी रोटी की तसल्ली" जनता की संतोषवृत्ति और समझौता परस्ती बयान करती है , ‘सभा चालू रखो' प्रतिरोध कुचलने की कथा है , ‘दौरा’ में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की पुख्तगी है ‘ "मोहभंग" मेँ व्यवस्था से मोहभंग के बावजूद टूटन न बताकर यह संकल्प व्यक्त हुआ है , ‘‘मै कदापि फ्रीज नहीं होउंगा,’’। "अंतर्द्वंद्व" प्रतिरोध की तैयारी की कहानी है ‘रोजगार का अधिकार" न्याय व्यवस्था की पोल खोलती है ‘चेतना' संघर्ष के लिए सचेत होने की प्रेरक कथा है , "आंतक" के मूल में सांप्रदायिकता है , कथाकार नब्ज पर अंगूली रखता है ‘‘आदमी को अंधा बनाने की कीमियागीरी इन्हीं गुरूद्धारों, मस्जिदों और मंदिरों में व्याप्त है, "अंधी दौड़" मेँ आम आदमी के जीवन संघर्ष की अनन्त यात्रा को प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मिली है ‘रोमांस के रंग' प्रेम कथा है पर यथार्थ की धरती पर। "अंतहीन उंचाइयॉं" में कथाकार मनुष्य का ध्यान प्रकृति के अमिट सौन्दर्य की ओर ले जाता है , ‘धापू घाचण सोचती है’ में आम आदमी की तुलना घाणी के बैल से की गई है , खास कर औरत जात की, ‘अधेरे द्धीप प्रकाश की खोज करके अपना अंत आशावादी करती है , ‘‘फैसला’ व्यवस्था की मिली भगत की कहानी है , "आत्महंता" बेरोजगार युवक के आत्महंतत्व की क्रमिक कथा हे , हड़ताल भगीरथ परिहार के शैल्पिक कौशल का उदाहरण हे , इसमें एक - एक शब्द एक -एक वाक्य की तरह है , शैलीप्रधान होते हुए भी कथ्य प्रधान है और मजदूर के अनन्त संघर्ष की अंतहीन कहानी कहती है, ‘टूल’ आम आदमी के मोहरा बनने की कथा है , ये तो हुई भगीरथ परिहार की लघु कथाओं पर विहंगम दृष्टि , अब हम समीक्ष्य संकलन में भूमिका रूपी आलोचना शास्त्र में प्रवेश करते है जिसे भगीरथ ने ‘लघुकथा लेखन की सार्थकता शीर्षक दिया है ,

       भगीरथ बताते है कि लघु कथा एक सर्वपठनीय एवं सहज बोध गम्य विधा है , ये रचनाएं कम समय में ज्यादा पाने का एहसास देती है लघुकथा संप्रेषणीय  होती  है  लघुकथा जनविधा है जो जन भाषा का प्रयोग करते हुए जनता के दुख -दर्दो और आकांक्षाओं को व्यक्त करती हे , लघुकथा एक प्रहारक विधा है जो राजनैतिक पैंतरेबाजी, भ्रष्टाचार अत्याचार और अनैतिकता पर प्रहार करती है, लघुकथाएं बताती है कि सामाजिक रिश्तों में कितना ठंडापन आ गया है और व्यक्ति कितना आत्मकेन्द्रित हो गया है!
भगीरथ लघुकथा का मर्म व्यक्त करते हैं, इस विधा ने साम्प्रतिक जीवन की जटिलताओं को सरलीकृत रूप में प्रस्तुत किया, यही वह विधा है जिसने छोटे आदमी के छोटे-छोटे संघर्षो को  वाणी दी है , अब महानायक का समय नहीं रहा बड़ी -बड़ी त्रासदियॉं घटित नहीं होती, जीवन अपनी गति से बहता है उसमें अनावष्यक नाटकीय उतार-चढ़ाव और अप्रत्याषित मोड़ नहीं आते, रोजमर्रा की छोटी -छोटी घटनाएं लघु -कथा में घटती है , इस प्रकार यह विधा बेहतर समाज निर्माण की भूमिका तैयार करती है , लघु कथा आज की विसंगतियों , विरोधाभासों और विडम्बनाओं पर सटीक चोट करती है, पतनशील मूल्यों व नितांत स्वार्थ-परता पर व्यंग्य करती है, इसके प्रभाव में बच्चे से बूढ़े , सामान्य पाठक से गंभीर चिंतक तक है, रवीन्द्र नाथ टैगोर , खलील जिब्रान , शेखसादी जैसे महान लेखकों ने लघु कथाएं लिखी है ।इसमें किस्सागोई से दार्शनिक फलसका तक समाया हुआ है। भगीरथ लिखते हैं कि कोई भी विधा तभी संपुष्ट होती है जब लेखक उसे सम्पुर्णतः अपनाते है और अपनी मुख्य विधा बनाते है कई लेखक हैं जिंहोने मात्र इसी में लिखा है और  लघुकथा ही से निज पहचान निर्मित की है लघुकथा की तीक्ष्ण दृष्टि वहीं पहले जाती है जहॉं व्यक्ति, परिवार, समाज या व्यवस्था में संड़ांध आ रही है इसलिए चाहकर भी शोषक -षासक इस विधा का निज हितार्थ उपयोंग नहीं कर सकते , यहॉं तक कि प्रेम और रोमांस के लिए इस विधा में स्पेस नहीं है, भगीरथ कहते है कि लघुकथा आसान विधा नहीं है , न यह वह विधा है जो चटपटी मसालेदार सामग्री मुहय्या कराती हो,

       यहॉं तक कि भगीरथ ने लघु कथा समीक्षा के मानदण्ड तय कर दिये, कथानक, कथ्य, भाषा शैली, संवाद , प्रभाव, संप्रेषण, कसावट, मूल्य -बोध इस विधा के मानक है , लघुकथा के लघु कलेवर में अनावश्यक प्रसंग, विवरण व विस्तार की गुंजाइश  नहीं है, सवांद चुस्त -सटीक एवं संक्षिप्त होने चाहिए, लघु कथा की भाषा जीवन्त, प्रवाहमयी सांकेतिक व व्यंजनात्मक होनी चाहिए, लघु कथा की भाषा दो टूक, व्यग्यात्मक जनभाषा होनी होनी चाहिए लघुकथा का कथ्य पैना, प्रहारात्मक, मार्मिक हृदयस्पर्षी, नई जमीन तोड़ने वाला, वैविध्यपूर्ण, एकान्वितियुक्त होना चाहिए, कथानक सामान्य जीवन से, सामाजिक सरोकारों से  उठने वाले, छोटे काल खंड में समाहित हों, जटिल व लम्बे न हो, लघुकथा संप्रेषित होकर ही सौन्दर्यबोध जगाती है, भगीरथ निर्मम समीक्षा के पक्षधर नहीं है, वे कहते है, "समीक्षा के मानदण्ड श्रेष्ठ रचनाओं को आधार बनाकर तय किये जाते हैं न कि मानदण्ड के आधार पर श्रेष्ठ रचनाएं रची जाती है, आठवें दशक में क्यों अचानक  यह विधा महत्वपूर्ण हो गई, परिहार लिखते हैं, ‘‘मामूली आदमी के मामूली जीवन में महत्वपूर्ण होती मामूली बातों की अभिव्यक्त्ति लघुकथा कर सकती थी ,जो कथ्य की प्रमुखता पर बल देती थी " , वे कहते है कि कथ्य की अस्पष्टता लघुकथा को कमजोर कर देती है, इसमें प्रधान तथा गौण कथ्य समानानंतर नहीं चल सकते भगीरथ लिखते है , प्रभाव में लघुकथा 'घाव करे गंभीर' प्रकृति की होती है, लघुकथा नीतिकथा की तरह  निष्कर्ष नहीं देती , कथ्य कभी प्रछन्न भी हो सकता है लघुकथा की सरंचना परिहार कुछ यूं परिभाषित करते है, ‘‘लघुकथा अक्सर द्धंद्ध से आरंभ होकर तेजगति से चरम की ओर चलती है तथा चरमोत्कर्ष पर अप्रत्याशित ही समाप्त हो जाती हे , लघुकथा का अंत अक्सर चौंकाने वाला तथा हतप्रभ करने वाला होता है, इस तरह का अंत पाठक की जड़ता को तोड़ता है" लघुकथा का कथानक सामान्य जनों की आकांक्षाओं , सपनों संघर्ष और दुख को व्यक्त करते है, अक्सर लघुकथा जीवन की कुरूपता पर फोकस करती है, लघुकथा में अमूर्त कथानक कम मिलते है, न इसमें परिवेश  के विस्तृत विवरण होते है, न चरित्र चित्रण, जनभाषा में व्यक्त होने पर  लघुकथा मुहावरें, लोकोक्तियों व व्यंग्योक्तियों से भाषा सौन्दर्य लाती है, लघुकथा का कथ्य विचारधारात्मक भी हो सकता है और संवेदनात्मक भी ।

कथानक मौलिक यथार्थपरक व विश्वसनीय होना चाहिए। अंतियथार्थवादी, अतिरंजित, वीभत्स कथानक लघुकथा के लिए वर्जित है, इसमं उपकथाएं व अंतःकथाएं नहीं होती लघुकथा का कथ्य व्यवस्थाजन्य विकृतियों विषमताओं और विसंगतियों पर केन्द्रित रहते है, लघुकथा राजनैतिक-प्रषासनिक भ्रष्टाचार अवसरवाद व छ्द्म मानवीय सम्बंधों का उद्घाटन करती है, भगीरथ परिद्धार ने लघुकथा की ये शैलियॉं परिगणित की हैः- 1  विरोधाभास    2  रूपक   3 संवाद   4  पैरोडी   5  प्रतीक   6   व्यग्य   7  दृष्टांत  8  अतिरंजना    9  एकालाप  10  गद्यगीतात्मक  11  फेंटेसी   12  आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक   13  अमूर्त  ।   इस प्रकार भगीरथ परिहार ने पहले भूमिका के रूप  में सेद्धांतिकी  उपस्थित की, तदन्तर व्यहारिकी के रूप में अपनी पचहत्तर लघु कथाएं रखी। लघुकथा के सौन्दर्यशास्त्र और उसकी पुष्टि के लिए प्रतिनिधि पचहत्तर लघु कथाओं हेतु भगीरथ परिहार बधाई के पात्र है।

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